फोटो कैप्शन- भुलाटोला सोसाइटी में तौल के बाद बारदाने सिलाई करने की जगह नहीं
पतला धान में करोड़ों का खेल: केसीजी जिले में 1.27 करोड़ की अवैध कमाई
केसीजी जिले की सरकारी धान खरीदी समितियों में पहले अधिक वजन तौल और रसूखदार किसानों का धान बिना तौल सीधे लॉट में खाली कराने के मामले सामने आ चुके हैं। अब पतला धान की खरीदी में एक और गंभीर खेल उजागर हुआ है। रागनीति की पड़ताल में सामने आया है कि बारदाना और सिलाई प्रक्रिया की आड़ में पतला धान निकालकर समितियों द्वारा करोड़ों की अवैध कमाई की जा रही है, जिसका कोई लेखा-जोखा सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं है।
जिले में 4.32 लाख क्विंटल पतला धान की खरीदी
आंकड़ों के अनुसार अब तक केसीजी जिले में 4,32,033.6 क्विंटल पतला धान की खरीदी की जा चुकी है। इसके लिए कुल 10,80,084 बारदाने का उपयोग हुआ। शासन के नियमों के अनुसार खरीदी में 50 प्रतिशत पुराने और 50 प्रतिशत नए बारदाने का इस्तेमाल अनिवार्य है।
नए बारदाने में शुरू होता है असली खेल
नियमों के मुताबिक लगभग 5,40,042 नए बारदानों में पतला धान भरा गया। पतला धान की प्रकृति ऐसी होती है कि जब किसान सरकार के तय मानक के अनुसार 40 किलो (बोरे का वजन छोड़कर) धान भरता है, तो बारदाने में सिलाई की पर्याप्त जगह नहीं बचती।
इसी का फायदा उठाकर समिति के कर्मचारी “सिलाई में दिक्कत” का हवाला देते हुए हर नए बारदाने से 1 से 2 किलो धान निकाल लेते हैं।
5,400 क्विंटल धान बिना किसी रिकॉर्ड के
यदि न्यूनतम 1 किलो प्रति बारदाना भी निकाला जाए, तो 5,40,042 बारदाने × 1 किलो = 5,40,042 किलो, यानी 5,400.42 क्विंटल धान। इस निकाले गए धान को अन्य बारदानों में भरने के लिए करीब 13,501 अतिरिक्त बारदाने की जरूरत पड़ी होगी है, जिसका उल्लेख न खरीदी रजिस्टर में होता है, न स्टॉक रजिस्टर में।
पांडादाह, जालबांधा और भुलाटोला में उजागर हुई अनियमितता
रागनीति की पड़ताल के दौरान पांडादाह, जालबांधा, भुलाटोला सहित अन्य समितियों में इस तरह की प्रक्रिया देखी गई। सरकार बारदाने का हिसाब लेती है ना कि वजन की। वजन में कमी को सूखत बता देते है।
सूखत की आड़ में अवैध मुनाफा
जब ट्रक राइस मिल पहुंचता है और धर्मकांटे पर वजन होता है, तो निर्धारित वजन से कम निकलता है। इसे सूखत बताकर समिति का नुकसान दर्ज कर दिया जाता है। जबकि वास्तविकता यह है कि यह कमी पहले ही सिलाई के समय धान निकालने से पैदा हो चुकी होती है।
समर्थन मूल्य के हिसाब से 1.27 करोड़ की काली कमाई
सरकारी समर्थन मूल्य के अनुसार 5,400.42 क्विंटल पतला धान की कीमत करीब 1,27,93,594 रुपए बैठती है। यानी जिले में केवल पतला धान की इस प्रक्रिया से ही लगभग 1.28 करोड़ रुपये की सरकारी राशि की नुकसान हुआ है।
नुकसान कागजों में समिति का, फायदा कर्मचारियों को
नियमों के तहत सरकार केवल बारदाने का हिसाब लेती है, धान के वास्तविक वजन का नहीं। सूखत को समिति का नुकसान मान लिया जाता है और उसकी भरपाई समिति के खाते से होती है। प्रबंधक से व्यक्तिगत वसूली नहीं होती जिसकी वजह से प्रबंधक भी अवैध बारदाने का हिसाब नहीं रखती है।
पूरे जिले में फैला है पैटर्न
यह केवल एक-दो समितियों तक सीमित मामला नहीं है। यह केसीजी जिले में पतला धान की खरीदी में यही तरीका अपनाया जा रहा है, जिससे समितियों और कर्मचारियों को अवैध लाभ, सरकारी राशि को भारी नुकसान, और किसानों के हिस्से का धान गायब हो रहा है।
एक्स्ट्रा बारदाना में धान रखने पर पंचनामा बनाना अनिवार्य
केसीजी जिले के सहायक आयुक्त राज किशोर झा ने कहा कि यह बात सही है कि नए बारदाने में सामान्यतः पतला धान तौल के बाद सिलाई में कठिनाई होती है। इसी को देखते हुए समितियों को कहा गया है हैं कि यदि किसी बारदाने से धान निकालना पड़े, तो उसे अन्य बारदाने में रखकर पंचनामा बनाना अनिवार्य होगा।उन्होंने कहा कि यदि बिना पंचनामा के समिति परिसर में खरीदी से अधिक बारदाने में धान पाया जाता है, तो उसे अवैध धान माना जाएगा और संबंधितों पर कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, यदि बारदाने से निकाले गए धान को बेचने की कोई शिकायत सामने आती है, तो उस पर निश्चित रूप से कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
वजन मेंटेनेंस करने बार दाने दिए जाते हैं अधिक- प्रबंधक
भुलाटोला धान खरीदी समिति के प्रबंधक प्रफुल वर्मा ने उदाहरण देते हुए बताया कि जब पतला धान का 280 क्विंटल का डीओ कटता है, तो उसके अनुसार 700 बारदाने देना पड़ता है। उन्होंने कहा कि सिलाई के दौरान जो धान बारदाने से निकलता है, उसे अतिरिक्त बारदाने में रखा जाता है। और वजन की भरपाई करने के लिए 700 बारदाने की जगह 700 से अधिक बार दाने दिए जाते हैं। प्रफुल वर्मा के अनुसार, जरूरत पड़ने पर यह सीपेज के माध्यम से भी वजन की भरपाई की जाती है।